ख्वाहिशें ख़त्म ख़त्म सी कहीं थम सी चुकी हूँ मैं
मेरे पास पंख भी हैं और हवा भी सही दिशा में है फिर भी
जमी जमी सी कहीं जैसे मर चुकी हूँ मैं।।।
ऐसा लगता है जैसे......
बात करते करते सब कुछ भूल जाती हूँ मैं
क्या कहना था मुझे क्या कहती चली जाती हूँ मैं
कहीं असमंजस में फसीं खुद को खोती चली जाती हूँ मैं।।।
ऐसा लगता है जैसे.....