Wednesday, November 29, 2017

ख्वाहिश के पंख

मैं उनके प्यार के पंख फैलाकर उड़ रही थी.. 
इतनी खुश इतनी मग्न सारा आसमॉ मेरा ही तो था.. 
तभी एक जोर सी हवा चली मैं लड़खड़ा के गिरी.. 
अब जब होश आया तो पता चला न वो प्यार मेरा था.. 
न वो पंख मेरे थे.. 
मैं सिर्फ ख्वाहिशों के पंखो पर उड़ रही थी..
इसलिए एक मामुली सी हवा मुझे आसमॉ की बुलंदी से जमीं पर ले आयी..

Tuesday, November 28, 2017

जिंदगी

ज़िंदगी तु कितनी अजीब हैं?
बेवजह का हँस लेती हुँ
इसीलिये तु इतना रूलाती है..
चल ठीक है नहीं हँसती
सच कहुँ तो हँसी अब आती ही नहीं है..
अबतो बस..
चल कोई नहीं.. जो है सो है
तु बता अभी कितने दिन और बाकी है?
मुझे इसतरह हर लम्हा जलने के?
असली आग कब मुझे सफेद लिबास
में निगलेगी?
अभी तो वो भी मुझसे आँख चुराये हुए हैं..
बस तु ही नहीं छोड़ती साथ मेरा
बाकी सब तो..

Monday, November 27, 2017

सदियों का फासला

उसने बोला था
वो बस मेरा हैं..
सच बस इतना है
कि सब हवा-हवाई था..
न वो शख्स मेरा था
न उसकी बातें
वो तो बस एक
क्षितिज बिन्दु था
दूर से देखने पर
मेरा.. पास जाने पर
दूर-और-दूर
.
.
.
.
.
.
.......  .....  ...  ..  .
बहुत दूर
जैसे सदियों का
 फासला।।।

Sunday, November 26, 2017

सजा

मैं उनसे कभी कुछ छिपा नहीं पायी
और वो मुझे बहुत कुछ बता नहीं पाये..
पता नहीं ऐसी क्या खामी थी मुझमें
जो मैं आज तक समझ नहीं पायी
बस वो रिश्ता जो मैं खुबसूरत समझती थी
और उनके लिए एक घुटन था शायद
टुट गया नहीं तोड़ दिया उन्होनें
साँसें जकड़ ली थी मैं ने उनकी
अपनी मनमानी के बोझ से
क्षमा क्या माँगु अब तो बस
सजा ही बाकी है!!!!!!!!!!

Friday, November 24, 2017

उसने बोला था
वो बस मेरा हैं..
सच बस इतना है
कि सब हवा-हवाई था..
न वो शख्स मेरा था
न उसकी बातें
वो तो बस एक
क्षितिज बिन्दु था
दूर से देखने पर
मेरा.. पास जाने पर
दूर-और-दूर
.
.
.
.
.
.
.......  .....  ...  ..  .

हमारा रिश्ता

हाँ हमारा रिश्ता बस हम दोनों तक सीमित था,
 कभी सोचा ही नहीं था कि तुम युंह मुकर जाओगे,
 मेरी जिम्मेदारियाँ तुम्हें बोझ लगने लगेगी,
तुम युंह छिटक दोगे मुझे जैसे मैं कभी इंसा थी ही नहीं
 एक सामान थी जिसे सुख सुविधा के अनुसार खर्च कर लिया
 फिर उसकी जगह कुछ नया सामान ले लिया
 और भूल गये मेरा भी कोई वजुद था,
तुमने मेरे साथ ऐसा इसलिए भी किया क्योंकि
 यह करना आसान था, मेरे साथ रहते तो लड़ना पड़ता
 वो भी आपके अपनों के साथ,
इसलिए आपने कुर्बानी दे दी,
मेरे सपनों की, मेरे विश्वास , मेरे आत्म-सम्मान की,
वो आसान था क्योंकि पता था आपको
 मैं कभी भी आपके फैसलों के बीच नहीं आऊँगी,
कभी जबरदस्ती आपकी जिंदगी में रहने की कोशिश भी नहीं करुँगी,
इसलिए आपने भी एक पल भी मेरे बारे में नहीं  सोचा..
आज धन्यवाद कहने के अलावा कुछ और बचा ही नहीं हैं
हमारे और तुम्हारे बीच..
मन का एक गुबार था गर गिला लगे तो माफ कीजिएगा..

Thursday, November 23, 2017

चुभन

अभी जो कुछ हो रहा है..
जो हम हारे हैं आपके नाम पर..
कभी सामान्‍य हो जायेगा..
आज जो हम आपके लिए कोई मूल्य नहीं रखते..
शायद कल आप भी हमें याद न आये..
पर अभी यह पल बहुत कष्टदायक हैं..
नश्तर की तरह चुभ रहा हर क्षण..
कुछ नहीं कहना चाहती पर
जीभाः है - कि बरबस बोले जाती हैं
अनायास ही सैकड़ों विचार कौंधते हैं मस्तिष्क में
और फिर एक तुफां सा
मुझे इतना विचलित कर जाता है कि
मैं बिखरने लगती हुँ सुखे पत्ते की तरह..
मायुसी का काला साया अन्दर तक युँह हिला जाता हैं
जैसे मैं अभी कुछ हुँ ही नहीं
जैसे कभी कुछ थी ही नहीं
क्या करूँ बहुत मुर्ख हुँ
कभी समझ ही नहीं पायी
आपकी हृदय की असुविधा को
मैं तो यही सोचती रही कि आप मेरे साथ बहुत खुश हैं
प्रेम की पट्टी बांधे सोच ही न सकी
आपका प्रेम कोई और हैं
आपकी तलाश कोई और हैं..!!!!!!!!!!!!!!!

Wednesday, November 22, 2017

तलाक़

उसने मुझे
तलाक-तलाक-तलाक
नहीं बोला
क्योंकि
उसमें तो
सबके सामने
"मुझे कुबूल है"
      है
कहने की
हिम्मत
ही
नहीं
थी
😢

धोखा

कभी कभी सब कुछ बेमायने सा हो जाता है.. यह सोचना.. यह खुशियां मनाना.. यह साँस लेना.. प्रेम करना.. जागते ही ज़िंदगी की सच्चाई कचोटना शुरू कर देती है.. एक चुभन.. एक नीरसता.. तमाम जिंदगी की ख्वाहिशें.. सब कुछ एक धुन में नाचने लगती है.. मजाक उड़ाने लगती है.. कहती है देखो तुम जिंदा हो.. तुम मरी नहीं हो.. तुम जिंदा हो.. तुम मर ही नहीं सकती.. चाहकर भी तुम मर ही नहीं सकती..!!!!!!!!!!!!!!!!!!
 और मैं एक चुभन एक मजबूरी एक धोखे के साथ उठ जाती हुँ.. हमेशा की तरह..
शुभ प्रभात 👏👏👏

Tuesday, November 21, 2017

सामाजिकता

 सामाजिकता को समझने की कोशिश कर रही हैं पर उलझती जा रही हुँ सही और गलत के बीच में_।।।
 समाज का बदलता परिवेश हमें नारकीय जीवन की ओर धकेल रहा है। इंसान के साथ-साथ हवा भी इतनी विषैली हो गयी है कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया हैं। इसका मूल कारण हैं समाज में ईमानदारी की कमी हैं और यह कमी हर जगह दिखाई देती है फिर चाहे वो रिश्ते हो या व्यवसाय।
 हम एक खोखले समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं या कहना गलत न होगा कि हम समाज को खोखला करते जा रहे हैं।  समाज का पर्याय ही बदल रहा है समाज द्वारा निर्धारित रीति-रिवाज सिर्फ एक ढकोसला बनकर रह गये हैं लोग स्वार्थी हो गये हैं परम्परायें अपना वजूद खो रही हैं।
 ऐसे में अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है तो उसको काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है लोग उसको पागल घोषित कर देते हैं और उसको विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो। यह है हमारे समाज का वर्तमान स्वरूप।।।
 बचपन से बच्चों को शिक्षा दी जाती है कि सच बोलो, ईमानदारी से रहो, दूसरों को सम्मान देने के लिए प्रेरित किया जाता है परंतु जैसे जैसे वे बड़े होते हैं उन्हें बताया जाता है कि वह किताबी ज्ञान है और जिन्दगी किताबी ज्ञान से नहीं जिया जाता है फिर सच्चाई और ईमानदारी का कहाँ-कहाँ इस्तेमाल करना है और कहाँ दरकिनार करना है यह सिखाया जाता है यह एक सामाजिक प्रकिया है और समाज इसको स्वीकार भी लेता है दुखद हैं पर यही सत्य है।।। 

सच

जिसको रुकना होता है वो समझता है जानता है कभी कभी तुमको तुमसे ज्यादा ।। जिसको जाना होता है वो चला जाता है चाहे जितना चीख चीखकर मिन्नतें करो फ...