सामाजिकता को समझने की कोशिश कर रही हैं पर उलझती जा रही हुँ सही और गलत के बीच में_।।।
समाज का बदलता परिवेश हमें नारकीय जीवन की ओर धकेल रहा है। इंसान के साथ-साथ हवा भी इतनी विषैली हो गयी है कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया हैं। इसका मूल कारण हैं समाज में ईमानदारी की कमी हैं और यह कमी हर जगह दिखाई देती है फिर चाहे वो रिश्ते हो या व्यवसाय।
हम एक खोखले समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं या कहना गलत न होगा कि हम समाज को खोखला करते जा रहे हैं। समाज का पर्याय ही बदल रहा है समाज द्वारा निर्धारित रीति-रिवाज सिर्फ एक ढकोसला बनकर रह गये हैं लोग स्वार्थी हो गये हैं परम्परायें अपना वजूद खो रही हैं।
ऐसे में अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है तो उसको काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है लोग उसको पागल घोषित कर देते हैं और उसको विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो। यह है हमारे समाज का वर्तमान स्वरूप।।।
बचपन से बच्चों को शिक्षा दी जाती है कि सच बोलो, ईमानदारी से रहो, दूसरों को सम्मान देने के लिए प्रेरित किया जाता है परंतु जैसे जैसे वे बड़े होते हैं उन्हें बताया जाता है कि वह किताबी ज्ञान है और जिन्दगी किताबी ज्ञान से नहीं जिया जाता है फिर सच्चाई और ईमानदारी का कहाँ-कहाँ इस्तेमाल करना है और कहाँ दरकिनार करना है यह सिखाया जाता है यह एक सामाजिक प्रकिया है और समाज इसको स्वीकार भी लेता है दुखद हैं पर यही सत्य है।।।
समाज का बदलता परिवेश हमें नारकीय जीवन की ओर धकेल रहा है। इंसान के साथ-साथ हवा भी इतनी विषैली हो गयी है कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया हैं। इसका मूल कारण हैं समाज में ईमानदारी की कमी हैं और यह कमी हर जगह दिखाई देती है फिर चाहे वो रिश्ते हो या व्यवसाय।
हम एक खोखले समाज का हिस्सा बनते जा रहे हैं या कहना गलत न होगा कि हम समाज को खोखला करते जा रहे हैं। समाज का पर्याय ही बदल रहा है समाज द्वारा निर्धारित रीति-रिवाज सिर्फ एक ढकोसला बनकर रह गये हैं लोग स्वार्थी हो गये हैं परम्परायें अपना वजूद खो रही हैं।
ऐसे में अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है तो उसको काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है लोग उसको पागल घोषित कर देते हैं और उसको विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है जैसे उसने कोई पाप कर दिया हो। यह है हमारे समाज का वर्तमान स्वरूप।।।
बचपन से बच्चों को शिक्षा दी जाती है कि सच बोलो, ईमानदारी से रहो, दूसरों को सम्मान देने के लिए प्रेरित किया जाता है परंतु जैसे जैसे वे बड़े होते हैं उन्हें बताया जाता है कि वह किताबी ज्ञान है और जिन्दगी किताबी ज्ञान से नहीं जिया जाता है फिर सच्चाई और ईमानदारी का कहाँ-कहाँ इस्तेमाल करना है और कहाँ दरकिनार करना है यह सिखाया जाता है यह एक सामाजिक प्रकिया है और समाज इसको स्वीकार भी लेता है दुखद हैं पर यही सत्य है।।।
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