जिसको जाना होता है वो चला जाता है चाहे जितना चीख चीखकर मिन्नतें करो फरियाद करो।।
ज़ख्म भरते नहीं कभी समय के साथ भी बस इन्तजार रह जाता है गुजरते हर वक्त के साथ कि शायद वो कहीं से आ जाये बस कुछ नजरभर दिख जाए खुद व खुद माफ भी कर दिया उसके उस जख्मों को जो देकर वो अलविदा भी कह गया पर मैं अभी भी उस ड्योढ़ी को छोड़ ही नहीं पायी कोशिश भी की ना जाने कितने दफा पर भाग्य में जब आग में जलना ही है तो झुलसना तो मुकद्दर बनना ही था।।
तुमको जाना था चले गए बस चुभन ही रह गयी इस पहलु में हमारे
हमने हर एक से वफ़ा में गंवा दी अपनी यह जिंदगी पर हमारे दामन में बस राख के सिवा कुछ ना बचा ।।
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